आर्य पी जी कॉलेज पानीपत में जेंडर, मर्दानगी और हिंसा की संस्कृति विषय पर ओपन हाउस डिस्कशन का आयोजन

रिवार में लड़कों को लड़कियों से पेश कैसे आया जाए सिखाने की जरूरत: आनन्द पंवार

पानीपत

आर्य पीo जीo कॉलेज में ब्रेकथ्रू संस्था द्वारा जेंडर, मर्दानगी और हिंसा की संस्कृति विषय पर ओपन हाउस डिस्कशन का आयोजन किया गया, जिसका मुद्दा सामाजिक लिंग आधार पर गैर बराबरी और यौनिक हिंसा रहा। प्रोग्राम की शुरुआत एन एस एस प्रोग्राम ऑफिसर श्री विवेक गुप्ता जी ने उपस्थित अतिथियो का स्वागत कर की और बाद में ब्रेकथ्रू पानीपत के सयोंजक संजय कुमार जी ने बताया कि आज के सेमिनार में सम्यक संस्था पुणे के सयोजक *आंनद पॉवर* हैं जो दुनिया के बहुत सारे देशों खासकर साउथ एशिया में मर्दानगी, गैर बराबरी और हिंसा पर काफी काम कर चुके हैं।

आनंद पंवार जी ने कहा कि हमारा समाज में कई भ्रांतियां हैं। समाज सोचता है कि अगर एक लड़की पायलट बन गई है तो बदलाव आ गया है। एक लड़की के पायलट, प्रधानमंत्री, ऑफिसर बनने से समाज मे बदलाव जरूर आता है लेकिन गैर बराबरी दूर नहीँ हुई। दूसरा हमारे समाज मे ये कहा जाता है। कि आकड़ो को बराबर कर दो यानि 1000 लड़को के पीछे हज़ार लड़कियां तो बदलाव आ जाएगा। यह भी हमारे संमाज की एक भ्रांति है कि लिंग अनुपात बराबर हो जाएगा तो गैर बराबरी खत्म हो जाएगी। भेदभाव एक लड़का और लड़की में तब भी रहेगा। तीसरा आनद जी ने कहा कि नारी सशक्तिकरण के ऊपर कार्यक्रम कर दो तो बदलाव आएगा। पर ऐसे भी गैर बराबरी नहीँ खत्म होगी।

इसके बाद आंनद जी ने जैविक सेक्स और जेंडर के ऊपर बातचीत रखी कि इसमें क्या अंतर है। आनद जी के कहा कि जब बच्चा पैदा होता है। तो क्या हम उस बच्चे के सिक्स पैक देखकर बताते है कि यह लड़का है या लड़की पैदा हुई है। क्या उसके लंबे बाल देखकर हम बताते है कि लड़की पैदा हुई है। हम केवल जैविक लिंग को देखकर ही बताते है कि लड़का है या लड़की। परन्तु जब हमारा समाजीकरण होता है तो लड़कों को अलग काम और लड़कियों को अलग काम सिखाएं जाते है।

आनंद जी ने कहा कि कितनी लड़कियां ऐसी है जो सार्वजनिक स्थानों पर अंगड़ाई , खुजली आदि करती है तो जवाब आया नहीँ करती और जब ये पूछा कि कितने लड़के है तो जवाब आया लगभग सभी। तो इस बात पर आंनद जी ने कहा कि यहहै या जेंडर है। तो जवाब आया जेंडर। इस बात पर कहा कि हमे एक ऐसे चश्में से देखना होगा जो जैविक सेक्स और जेंडर में फर्क को दिखाये, तभी हम जैविक सेक्स और जेंडर को समझ पाएंगे।

आंनद जी ने कहा कि हमारे समाज मे लड़कियों के काम को उत्पादक श्रम में नहीं गिना जाता। पुरुष तो केवल 8 घंटे काम करके घर आते है और कुछ नहीँ करते वहीँ एक औरत 8 घंटे की नोकरी के बाद भी सारा घर का चूल्हा चौका करती है। और उसे उसका कोई वेतन भी नहीँ मिला, यही है गैर बराबरी।

इस कार्यशाला में आनद जी ने कालेज के बच्चों के सवालों के जवाब भी दिए और बहुत सारे सवाल कार्यशाला के दौरान निकल कर भी आए जिसका आनंद जी ने जवाब दिया। एक कॉलेज छात्रा ने यह सवाल किया। कि जब एक पुरूष और औरत एक ही काम को बराबर करते है तो पुरुष को उसी काम का ज्यादा वेतन मिलता है जबकि औरत को कम। आखिर ऐसा क्यों है ?

एक छात्रा का यह सवाल निकल कर आया कि हमारे समाज में मर्दानगी के चलते हमारे समाज के लड़के कॉलेज में तो बहुत बराबरी व भेदभाव रहित बात करते है, परन्तु घर जाते ही वही लड़के अपनी मर्दानगी को दिखाते है और परिवार वालो के ऊपर अपना रुतबा जमाते है।

एक अन्य छात्रा ने कहा कि मेरे पापा मुझे तो ये सिखाते है कि अपना बिस्तर खुद विछाना है। और सुबह खुद उस बिस्तर की तह भी लगानी है और भी बहुत कुछ। परन्तु मेरे पापा खुद ऐसे सारे काम मम्मी से करवाते हैं। जब मैंने पूछा कि पापा आप जो मुझे सिखाते हो वो आप खुद क्यो नहीँ करते तो कोई जवाब नहीँ आया। इसलिए मेरा सवाल ये है कि हमारे बड़े जो हमें सिखाते है वो खुद उस पर क्यों नहीँ चलते? बहुत से लड़कों और लड़कियों ने गैर बराबरी व बराबरी से जुड़े अपने बेहद व्यक्तिगत अनुभव भी शेयर किया। यह प्रोग्राम कई मायनों में सफल रहा।

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