जब हनुमानजी ने समुद्र में खुद ही फेंक दी थी रामायण, जाने क्या था मामला

मल्टीमीडिया डेस्क। हनुमानजी बल और बुद्धि के देवता हैं। रामायण में उनके बारे में कई प्रसंग हैं, जहां उन्होंने अपनी चतुराई और बुद्धि से परिस्थितियों को अपने नियंत्रण में किया। मगर, उनके बारे में कई ऐसे प्रसंग भी हैं, जिन के बारे में शायद आपको पता नहीं होगा। आज हम आपको ऐसे ही कुछ संदर्भों के बारे में जानकारी देने जा रहे हैं।

इसलिए लगाते हैं सिंदूर

रामायण की एक कथा के अनुसार एक बार माता सीता मांग में सिंदूर लगा रही थीं। तब हनुमानजी ने माता सीता जी को सिंदूर लगाते देखकर पूछा यह लाल द्रव्य जो आप मस्तक पर लगा रही हैं, यह क्या है और इसके लगाने से क्या होता है? इस पर सीताजी ने कहा कि यह सिंदूर है। इसके लगाने से प्रभु दीर्घायु होते हैं और मुझसे सदैव प्रसन्न रहते हैं।

चुटकीभर सिंदूर लगाने से प्रभु श्री रामचंद्र जी की दीर्घायु और प्रसन्नता की बात माता जानकी के मुख से सुनकर श्री हनुमान जी ने विचार किया कि जब थोड़ा-सा सिंदूर लगाने से प्रभु को लम्बी उम्र प्राप्त होती है, तो क्यों न मैं अपने सम्पूर्ण शरीर में सिंदूर पोतकर प्रभु को अजर-अमर कर दूं। वैसा ही करके हनुमान जब राम दरबार में पहुंचे, तो उनकी भक्ति देखकर श्रीराम ने कहा कि वत्स तुम जैसा मेरा भक्त अन्य कोई नहीं है और न ही होगा। मैं तुम्हें अमरत्व का वरदान देता हूं।

हनुमान जी के 108 नाम

रामायण के सुंदरकाण्ड के अनुसार, लंका से लौटते समय अरिष्ट पर्वत से कूद कर उन्होंने समुद्र पर किया था। भगवान हनुमान के 108 नाम हैं। इनमें से कुछ हैं- आंजनेया, महावीर, हनूमत, मारुतात्मज, मनोजवाय, कपीश्वर, महाकाय, रामभक्त आदि हैं।

एक पुत्र भी है उनका

हनुमान जी जब लंका दहन कर रहे थे, तब लंका नगरी से उठने वाली ज्वाला की तेज आंच से हनुमानजी को पसीना आने लगा। पूंछ में लगी आग को बुझाने के लिए हनुमान जी समुद्र में पहुंचे, तब उनके शरीर से टपकी पसीने की बूंद एक मछली के मुंह में चली गई थी। इससे वह गर्भवती हो गई और उसने वानर रूपी मानव मकरध्वज को जन्म दिया।

हनुमान ने लिखी थी रामायण

ऐसा शास्त्रों में वर्णन है कि भगवान श्रीराम रावण पर विजय प्राप्त करने के बाद अयोध्या लौट गए थे। इसके बाद हनुमानजी हिमालय पर शिव आराधना के लिए चले गए। इस दौरान उन्होंने हिमालय की पर्वत शिलाओं पर अपने नाखून से प्रभु श्रीराम के कर्मों का उल्लेख करते हुए हनुमद रामायण की रचना की। कुछ समय बाद जब महर्षि वाल्मिकी भगवान शंकर को अपनी लिखी रामायण दिखाने पहुंचे, तो उन्होंने हनुमान जी द्वारा रचित रामायण भी देखी।

हनुमद रामायण को देखकर वाल्मिकी जी निराश हो गए और उन्होंने कहा कि उन्होंने कठोर परिश्रम के पश्चात जो रामायण रची है, वो हनुमद रामायण के समक्ष कुछ भी नहीं है। इसलिए आने वाले समय में उनकी रचना उपेक्षित रह जाएगी। तब हनुमानजी ने हनुमद रामायण पर्वत शिला को एक कंधे पर उठाया और स्वयं द्वारा रचित रामायण को श्रीराम को समर्पित करते हुए समुद्र में फेंक दिया। तभी से हनुमान द्वारा रची गई हनुमद रामायण उपलब्ध नहीं है।

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